Sunday, June 23, 2013

khoj ka padav

मेरी खोज को एक पड़ाव मिल गया ..जीवन की पहेली कुछ समझ में आई है / मुझे शुरू से ही जिज्ञासा थी ....मानव ,आत्मा,परमात्मा इनका आपस में क्या सम्बन्ध है /संसार में विषमता क्यूं है ...कोई अमीर है कोई गरीब ......ये भाग्य का क्या खेल है ...क्या इनके पीछे कोई नियम है यदि है तो क्या ..आदमी जन्म क्यूं लेता है… क्या कोई ऐसी व्यवस्था है जिसमे जन्म से छुटकारा मिल जाता है. ..छुटकारा पाने के बाद फिर क्या होता है ...बहुत सारे ऐसे सवाल मन में चलते रहते है।अलग अलग धर्मो ने इन को अलग अलग तरीके से बताया है… पर मेरे मन को इनका जवाब  मिल नहीं पा रहा था ...जब मैं सब को जोड़ ने लगता तो कोई भी मॉडल सही नहीं बैठता ...मुझे संयोग से बुद्ध के बारे में पढने को मिला उनकी मुझे बहुत सी बाते बिलकुल अपने सवालो के उत्तर के रूप में लगी ...उन्होंने कहा आत्मा परमात्मा भ्रामक शब्द है… इनसे मानव का कोई हित सिद्ध नहीं होत….मैंने या शायद किसी ने भी अब तक इनमे से किसी को नहीं देखा है… मेरी तो ७० % माथापच् ख़त्गयी।शायद ..अंतर्मन से मेरी भी यही आवाज थी जो अब तक दबी हुई थी।एक प्रश्न का उत्तर तो मिला  ...बड़ी उपलब्धि थी।फिर उन्होंने कहा ..धर्म का विषय मानव का पहले खुद से फिर उसके बाद अन्य से सम्बन्ध होना चाहिये ...तभी वोह मानव के लिए उपयोगी है… किसी अन्य काल्पनिक ईश्वर।उन्होंने कहा ...आओ और देखो… 
किसी पर भी आँख मूदकर मत विस्वास करो।मेरे पर भी ....अपने विवेक पर विस्वास करो तुमको जो उचित लगे वह करो ..अपने द्वीप स्वयं बनो…. खुद को अपना आधार बनाओ।
उन्होंने कर्म नियम को सही बताया ...जो बोओगे वाही काटोगे ..यही नियम विसमता के पीछे है… थोडा जटिल भी है इसलिए कुशल और अकुशल कर्म को जानो ...तथा उसका पालन करो।
बुध ने बतया की संसार में दुःख है ..इनको जानो (जन्म ,ज़रा ,व्याधि,दौर्मनस्य  और कुछ स्वयं जनित) और दुःख से निकलने का मार्ग है ......
व्यक्ति को मैत्री ,करुणा ,मुदिता और उपेक्षा को जीवन में समाहित कर लेना चाहिये ..इसी मार्ग पर चलके दुःख को जीवन में कम किया जा सकता है। ..जीवन का पालन आलस के साथ नहीं कर्ममय होकर करना चाहिए ...कर्म कुशल हो ..अन्यथा वो दुःख का कारण बनेगे ..इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।मन और चित्त हमारे
अंदर विद्यमान है इनका नियमन बहुत आवश्यक है ...मन की विचारों की श्रंखला तोड़ने के लिए सतर्क रहने की ज़रुरत है। अपनी देह का ,विचारो का ,चित्त की अवस्था और मनोवृति पर सतत ध्यान रखने से हम सतर्क रहने लगते है.
और अंतिम मानव की देह मरणशील है ...संसार अनित्य और चिर परिवर्तनशील है।







 
Now these days, I am involved in meditation..as I practise it almost daily...It is really staisfying and fulfilling
In my search of truth of life I found teaching of Budhha and his religion the most appropriate for myself in the present time frame..
Its beautiful perception make quality of life better...

it says human are  just part of this nature...It is the nature who rules not
human...one should know it...change is universal truth